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Monday, 11 January 2016

धरती लिख भेजे पाती

धरती लिख भेजे पाती
सूरज नीचे आ रे
काँपती  फसलों को
गर्मी पहुंचा रे

आँगन के
घुटनो में दर्द है
मौसम ये बहुत ही सर्द है
बूढा  पीपल
मांगे रजाई
हुआ तू क्यों  हरजाई ?
अंजुरी भर धूप के दाने
हर घर में बिखरा रे
धरती लिख भेजे पाती
सूरज नीचे आ रे

कोहरे का अब
मान   घटा
मुख से तनिक बादल हटा
ये मरी
ठण्ड क्यों आई
सोचती रहती बुढ़िया माई
विधवा  धरा पर
शुभ  रंग बिखरा रे
धरती लिख भेजे पाती
सूरज नीचे आरे

पलकों पे
ओस के मोती
जमे आँसू
मुनिया जो रोती
सूरज ने
खिड़की बंद कर ली
कोहरे को
मनमानी चल ली
सर्द पड़े हवा के पैर
 गर्म मोज़े पहना रे
धरती लिख भेजे पाती
सूरज नीचे आरे

Friday, 23 January 2015

 मुस्काए सूरज



बादलों की धुंध में मुस्काए सूरज
खोल गगन के द्वार
धरा पर आए

गुनगुनाए धूप
आए स्वेटर सा आराम
अब तो भैया मस्ती में हों
अपने सारे काम
बाँध गठरिया आलस भागे
ट्रेन-टिकट कटाए
देखो
बादलों की धुंध में
शरमाए

अधमुंदे नयनों को खोले
सोया सोया गाँव
किरणें द्वार द्वार पर डोलें
नंगे नंगे पाँव
मधुर मधुर मुस्काती अम्मा
गुड़ का पाग पकाए
हौले
बादलों की धुंध में
कुछ गाए
पल्लवित कदंब  की छाँव में
बोली कोयलिया उस गाँव में
देख कदंब  के भाग्य सखी
होए जलन हर हाल सखी
काश मै कदम बन जाऊँ
प्रति पल उनका सानिध्य पाऊँ
हो इच्छा पूर्ति कदंब  की छाँव में
बोली कोयलिया उस गाँव में 

ग्वालों संग कान्हा खेले
डाली डाली हर्षित डोले
बचपन की मासूम बातें
माखन चोरी की घातें
रचे रचयिता खेल कदंब की छाँव में
बोली कोयलिया उस गाँव में

मुरली मधुर मनोहर बाजे
राधा के मन मंदिर साजे
छोड़ कामकाज गोपिया भागे
सुध बुध खोएं कृष्ण के आगे
बैठी रहीं कदंब  की छाँव में
बोली कोयलिया उस गाँव में

हरित पात लल्ला छुप जावे
माता  यशोदा को खिझावे
ग्वाल बाल सबसे पूछे कोऊ नहीं बतावे
ठाढी क्रोधित मैया कदंब को छाँव में
बोली कोयलिया उस गाँव में


चहुँ  ओर छाया कुछ कोहरा सा है
हथेलियों पर थिरकता है
पलकों  से लिपटता है
ओस  में भीग के
 स्वयं में सिमटता है
ह्रदय दर्पण में सोया एक चेहरा सा है
चहुँ  ओर छाया कुछ कोहरा सा है

शब्द ताखे से  उतरते नहीं
गेसू हवा में बिखरते नहीं
आँखों की ढिबरी में जलता है
पर काजल बन उन में सजता नहीं
क्यों छलकता नहीं लब पर जो ठहरा सा है
मेरे चहुँ  ओर छाया कुछ कोहरा सा है

चांदनी जब  उतरती है
चाँद की हसीं तभी बिखरती है
देख सुन्दरता लजाती है धरती
सकुचा के ड़ाल से लिपटती है
चमक जाता है मौसम जो हरा हरा सा है
चहुँ  ओर छाया कुछ कोहरा सा है
धरती का डोले मन
के बसंत ऋतू आई

सूरज जो छुप के बैठा था
खिड़की खोल ले मुस्काया
उसकी सुनहरी धूप ने
धरती का कण कण चमकाया
हर्ष हर्ष बोले सुमन
के बसंत ऋतू आई
धरती का डोले मन
के बसंत ऋतू आई

ओढ़ बसंती चूनर
धरा सुन्दरी  इतराए
बादल जो राही बन भटके 
उस का मन भी भरमाये
बहे बसंती बयार होके मगन
के बसंत ऋतू आई
धरती का डोले मन
के बसंत ऋतू आई 

फूलों ने घूँघट खोले
तो भवरे ने ली अंगड़ाई
पी का संग पाने को
प्रकृति सुन्दरी बौराई
प्रेम राग से गूंजे गगन
के बसंत ऋतू आई
धरती का डोले मन
के बसंत ऋतू आई

बसंत ऋतू आई
ठण्ड ने जो समेटी चादर
रस से भर गई
घरती की गागर
फूलों ने  शौल हटाया
सु गन्ध  का
झोका आया
मौसम ने ली झूम के अंगड़ाई
बसंत ऋतू आई

सूरज ने लिहाफ से झाँका 
अम्बर बोला
बाहर आजा
डरती राहों को उजाला मिला
झोले में धर  कोहरा
शीत घर की राह चला
सुनके गुनगुनी धूप मुस्काई
बसंत ऋतू आई

धरा करने लगी श्रृंगार
गले डाल
बसन्ती हार
मुख पर गुलाबी फूल खिले
नभ साजन से
 कजरारे नैन मिले
पीली चूनर जो हवा ने सरकाई
बसंत ऋतू आई


भारत की खुशबू
यहाँ भी आती है
जब बेटी घर में आरती गाती है

हरी चूड़ियों के
गीत वहाँ  बजते हैं
सावन आते ही
पेड़ों पर झूले पड़ते हैं
सजनी जो
'ऐ जी' कह कर बुलाती है
भारत की खुशबू
यहाँ भी आती है

तिरंगे से उगे सूरज
जग सबेरा हो
यादों के पंछी का
गली बसेरा हो
"जन गण"  की धुन
रूह सहलाती है
भारत की खुशबू
यहाँ भी आती है

पावन धरती दे
नदियों   को सहारा
रंगबिरंगी बोली से
रंगा देश सारा
स्नेह  घूप
मन- आँगन महकाती  है
भारत की खुशबू
यहाँ भी आती है
 सूरज देने गर्मी  उत्तर दिशा  में आगया


 
ठण्ड ने फैलाये पंख तो मन घबरा गया
सूरज देने गर्मी  उत्तर दिशा  में आगया

ठण्ड में कांपते पंक्षी बगुले सो गए
पक गयीं फसलें और खेत सुनहरे होगये
ढेर आनाज का आँगन में लगा गया
सूरज देने गर्मी  उत्तर दिशा  में आगया

बिहू ,लोहड़ी ,माघी ,पोंगल या कहो संक्राति
पूरे देश में फैली त्योहारों की क्रांति
खानो की खुशबु से मन मेरा हर्षा गया
सूरज देने गर्मी  उत्तर दिशा  में आगया

पतंग उड़े आकाश में बलखाती इठलाती
भैया उड़ाए पाटा चरखी मुझको पकड़ा दी
रंग गया अम्बर देखो इंद्रा धनुष छा गया
सूरज देने गर्मी  उत्तर दिशा  में आगया

शुभ हो ये दिन सब को कहती हूँ बस इतना
भारत वासी हो तो तुम  मान  इसका रखना
याद किया देस को तो तिरंगा दिलों में लहरा गया
सूरज देने गर्मी  उत्तर दिशा  में आगया



टांके फूल कनेर


आँगन की चूनर पे
टांके फूल कनेर

हरे पात की
झालर पर
पीले मोती सा सोहे
तोड़े इसको कोई तो
सफ़ेद आँसू से रोये
झुक के चूमे माथ जो
शरमाये मुंडेर 
आँगन की चूनर पे
टांके फूल कनेर

स्वर्ण पुष्प
की आभा
बिखरी  चहुँ ओर
हवा करे रखवाली
लेजाये न चोर
भरे ऋतुओं की हांड़ी
मुस्काये कुबेर 
 आँगन की चूनर पे
टांके फूल कनेर
 जला के टोर्च सूरज निकला

कोहरे की चादर
 रंग  पीला
जला के टोर्च
सूरज निकला
किरणों की गंगा
घरती उतरे कैसे
सोई बालियां
नींद से जगे कैसे
कलियों का घूँघट
  है अध खुला
जला के टोर्च सूरज निकला

दही कहे पापड़ से
संग मेरे होले
घी चले हौले
खिचड़ी से मिल ले
खुशबु से इनकी
अम्बर पिघला
जला के टोर्च सूरज निकला
सूरज तू रुकना  नहीं
 
 
 
सूरज तू रुकना  नहीं
कट जाये अंग तो
बादल के फाहे रखना
साँझ ढले जीवन की
पानी में उतारना
भीगना पर  बुझना नहीं
सूरज तू रुकना  नहीं

कोहरे का दानव
करे तुझको अँधा
साँस लेने का
हवा भी मांगे चंदा
तबभी तू झुकना नहीं
सूरज तू रुकना  नहीं

धरती का लंहगा
किरणों का बूटा
मौसम के आँगन
मटका टूटा
ओस पर फिसलना नहीं
सूरज तू रुकना नहीं
 
किरणों का टीका





धरती के माथे
किरणों का टीका


सूरज उतरे आँगन लीपे
हवा भर लायी
खाली पीपे
दूब हथेली ओस का छीटा
 रोया  बादल
ठण्ड ने पीटा
रंग मौसम का हो गया फीका
धरती के माथे
किरणों का टीका


पहन के स्वेटर
ठण्ड निकली
माथे उसके सरकी टिकली
सूरज मध्यम
कोहरा लौटा
घुंघ ने फिर आज दूध औटा
कांपती हांड़ी जा बैठी छीका
धरती के माथे
किरणों का टीका


टिकली (या टिकुली जिसको बिंदी भी कहते हैं )




सूरज नीचे आ रे



 धरती लिख भेजे पाती
सूरज नीचे आ रे
काँपती  फसलों को
गर्मी पहुंचा रे

आँगन के
घुटनो में दर्द है
मौसम ये  बहुत ही सर्द है
बूढा  पीपल
मांगे रजाई
तू क्यों हुआ हरजाई
अंजुरी भर धूप के दाने
हर घर में बिखरा रे
धरती लिख भेजे पाती
सूरज नीचे आ रे

कोहरे का अब मान   घटा
मुख से तनिक बादल हटा
ये मरी\ठण्ड क्यों आई
सोचती रहती बुढ़िया माई
विधवा  धरा पर
शुभ  रंग बिखरा रे
धरती लिख भेजे पाती
सूरज नीचे आ रे

शॉल ओढ़े
धूप जो निकली
नर्म किरणों से ओस पिघली
पत्तों की चादर
पानी की बून्द टपके
ठण्ड है बोल रहीं दीवारे सिमट के
सर्द पड़े हवा के पैर
 गर्म मोज़े पहना रे
धरती लिख भेजे पाती
सूरज नीचे आ रे

Saturday, 22 February 2014

शगुन  का संगीत
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मंडप के नीचे खड़ा
शगुन  का संगीत

उबटन की 
कटोरी चहके
निखरे बन्नी का रूप
जैसे फूलों के माथे पर
हल्की हल्की धूप 
चंचल हुए नैन मिला जो उनको मीत
मंडप के नीचे खड़ा शगुन का संगीत

पंडित के
कांधे चढ़
मन्त्रों की डोली आयी
फेरों का हाथ पकड़
सात वचन संग  लाई
ढोलक - मंजीरे ले कर आये मंगल गीत
मंडप के नीचे खड़ा शगुन का संगीत

मांग की
गलियों में
सिन्दूर ठुमक डोले
मन की कोरी गागर में
  प्रेम रस घोले
बने नये रिश्ते गिरी पुरानी भीत
मंडप के नीचे खड़ा शगुन  का संगीत


कोहबर में
देवता बैठे
करते  इंतजार
दरवाजे भाभी खड़ी
 मांगे नेग हज़ार
मौर -मौरी आपस में करते बात चीत
मंडप के नीचे खड़ा शगुन का संगीत
छूटे है  बचपन सखी री


फेरे आये मंडप में
सात वचनो के साथ
मेंहन्दी पीसी पत्थर पे
सजे  बन्नी के हाथ
भीगा है सपन  सखी री
छूटे है  बचपन सखी री

खेल खिलौने रूठे
करें न मुझसे बात
गुड़िया रोये घूँघट में
आँगन सारी रात
भोला था छुटपन सखी री
छूटे है बचपन सखी री

समधी बैठे आँगन
खाने भात
गारी की संग में
मिली सौगात
कैसा अनोखापन सखी री
छूटे है बचपन सखी री

Tuesday, 17 September 2013

क्यों हमने घर छोड़ा था ?

सुख चादर
में छेद मिले
लहरों लहरों भेद मिले
जेब भरी
मन खाली था
जीवन बना रुदाली था
फिर भी नाता जोड़ा था
क्यों हमने घर छोड़ा था ?

घर में
खुशिया चलती थी
ताख उम्मीदें पलती थी
माथे
अगर पसीना हो
अम्मा पंखा झलती थी
जो था क्या वो थोडा था ?
क्यों हमने घर छोड़ा था ?

सावन
आँगन उतरे
वसंत किवाड़ सजाये
शाम ,
सिंदूरी धूप से
आकर घर रंग जाये
इस दृश्य से मुँह मोड़ा था
क्यों हमने घर छोड़ा था ?

Tuesday, 26 March 2013

उड़ने लगे रंग

फागुन की झोली से
उड़ने लगे रंग

मौसम के भाल पर
इन्द्रधनुष चमके 
गलियों और चौबारों के
मुख भी दमके
चूड़ी कहे साजन से
मै  भी चलूँ संग

पानी में घुलने लगे
टेसू के फूल
 नटखट उड़ाते चलें
पांवो से घूल
 लोटे में घोल रहे
बाबा आज भंग

सज गई रसोई
आज पकवान चहके
हर घर मुस्काते चूल्हे
हौले से दहके
गोपी कहे कान्हा से
न करो मोहे तंग

Sunday, 25 March 2012




पुराने पल



 पुराने पल
शाखों से झड़ते  रहे 
आज, कल और कल

एक मैली सी
 गठरी में
कुछ सहेज के रखा था
कुछ पल थे
यादों के
गम कोई जो खटका था
पीड़ा  के शूल 
दिलों में  गड़ते रहे 
आज, कल और कल

बीते  लम्हे
खोले  तो
झरना सा बह उठा
भीगा
स्पर्श तुम्हारा
हौले से कह उठा
नाहक तुम
अतीत से लड़ते रहे
आज कल और कल
 
 पुराने पल
शाखों से झड़ते  रहे 
आज, कल और कल 

Friday, 27 January 2012

बादलों की धुंध में

बादलों की धुंध में
सूरज मुस्काये
खोल किवाड़ हौले  से
वो   धरा पर आये
गुनगुनी धूप दे
स्वेटर सा आराम
अब तो भैया मस्ती में  हो
अपने सारे काम
बांध  गठरिया आलस भागे
ट्रेन -टिकट कटाए
 बादलों की धुंध में
सूरज मुस्काये 

 पतंगों  के पेंच लड़े
और लड़े नैन
दिन में जोश भरा रहा
खामोश रही रैन
सुनहरी धूप  में
मन- चिड़िया  नहाये
 बादलों की धुंध में
सूरज मुस्काये

अधमुंदी आँखें खोले
सोया सोया गाँव  
किरणें द्वार द्वार पर डोले
देखो नंगे पाँव
मधुर मधुर मुस्काती अम्मा
गुड का पाग पकाए
बादलों की धुंध में
सूरज मुस्काये 

Thursday, 27 October 2011

खुशियों के गीत



ढोलक की थाप पर 
खुशियों के  गीत चले   

नव वसन 
धारण कर रात
दिन से छुपी -छुपी फिरे 
त्योहार को 
थाम  के मौसम 
चौखट चौखट  दीप धरे 
सजनी से मिलन को  
परदेसी मीत चले 

हवाएँ बाँधे 
बन्दनवार 
गुलाबी धूप  टाँकें 
खुशबू की 
सीढ़ी चढ़के 
पकवान रसोई से झाँके 
चूल्हे चढ़ें  बटुले 
सदियों की  रीत चले 

अँजुरी भर 
दुआएं है 
चंदा की गठरी में 
आशा के 
 जुगनू  चमकें 
झोपड़ी की  कथरी में 
उत्सव के द्वार  पर,
दीपक की प्रीत चले