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Friday, 22 May 2015

 सुंदरी मछली
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पात्र
सुंदरी मछली
सुंदरी मछली की सहेलियां (आप जितनी चाहे रख सकती हैं )
जलतू मछली
रोमा मछली ,
सोना मछली (जलतू मछली की सहेलियां )आप और भी सहेलियां ले सकती हैं
डॉक्टर मछली  
नदी है उसमे मछलियाँ है बहुत सारी एक मछली का नाम है सुंदरी मछली और एक का नाम है जलतू मछली lसुंदरी  मछली बहुत अच्छी मछली है सब को प्यार करती है और सभी उसको प्यार करते हैं सुंदरी को पढ़ने का बहुत शौक है वो हमेशा कोई न कोई बुक ले कर पढ़ती रहती है l जलतू मछली सब से बुरी तरह बोलती है कोई उसको प्यार नहीं करता lये सुंदरी मछली से जलन करती है ,और उससे नफरत करती है ,इसको पढ़ने का बिलकुल शौक नहीं है l
सीन १
सुंदरी मछली नदी में एक पत्थर पर बैठी पढ़ रही है उसके साथ उसकी सहेलियां
मछली १ "अरे सुंदरी क्या पढ़ रही हो"
मछली २ "हमें भी सुनाओ"
सुंदरी "मै शेर की  कहानी पढ़ रही हूँ "
सारी मछलिया हमें भी सुनाओ सुंदरी कहानी सुनाने लगती है यहाँ पर गाना होता है मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक किस्सा सुनो (केवल इशारे से सुन्दरी मछली एक्ट करती है   आवाज नहीं है ) इतने में जलतू मछली वहां आती है बुरा सा मुँह  बना के कहती है
जलतू मछली  अपनी सहेलियों से कहती है "अरे रोमा ,सोना मछली ये देखो ये कहानी सुना रही है इसको तो बस किताबों से मतलब है कैसे कपडे पहनती है फैशन का कोई पता नहीं"
रोमा मछली(जलतु की सहेली ) " हाँ सही कहा तुमने ."
सोना मछली (मुँह बना के ) (जलतु की सहेली )"इसको तो पढ़ने के आलावा कुछ   आता ही नहीं "हा हा हा (ये सभी जोर जोर से हँसने  लगती हैं )और चली जाती हैंl   सुंदरी की दोस्त मछलिया कहती है "इस जलतू मछली को मै अभी ठीक करती हूँ "l
सुंदरी मछली  " नहीं नहीं जाने दो उसका तो ऐसा स्वभाव ही है हम अपना स्वभाव उसके जैसा क्यों करे कोई बात नहीं वो भी हम जैसी मछली ही है बाद थोड़ा गुस्से वाली है"
सीन २
सुंदरी मछली अपनी सहेलियों के साथ आ रही है सामने से जलतु मछली अपनी सहेलियों के साथ आरही है सुंदरी मछली "अरे जलतु मछली रुको उस तरफ मत जाओ "
जलतु मछली "क्यों न जायूं तुम कौन होती हो मुझको रोकने वाली "
सुंदरी मछली "वो देखो ये विशेष तरह के पत्थर और पौधे हैं ऐसी जगह पर बड़ी मछलियाँ रहती है यदि तुम उस तरफ गयीं तो वो तुमको खा जाएँगी "जलतु मच्छी (कंधे उछला के )में तो जाउंगी तुमको क्या "जलतु मछली जाने लगती है पर देखती है की कोई दूसरी मछली उधर गयी , बड़ी मछली ने उसको पकड़ लिया जलतु मछली की सहेलियां कहती है "धन्यवाद सुंदरी तुमने हमको बचा लिया .वार्ना वो बड़ी मछली हमको खा गयी होती "जलतु मछली मुँह बनाके चली जाती है और पीछे पीछे उसकी सारी सहेलियां भी चली जाती हैl
सीन ३
एक बहुत सुन्दर सी चीज मच पर रखी है (कुछ भी रख सकते हैं जो खाने लायक जैसी लगे)
जलतु मछली मंच पर आती है  चीज को देखती है l अरे वह! ये तो बहुत अच्छी खाने की चीज है चलो खाते  हैं जलतु मछली  मन में सोचती है और जलतु मछली उसकी तरफ बढ़ती है इतने में सुंदरी वहां आती है l
सुंदरी "नहीं जलतु नहीं  उसको मत खाना "(जोर से बोलती है )जलतु "क्यों तुम खाना चाहती हो मेँ तो खाऊँगी "जबतक सुंदरी उसतक पहुँचती जलतु उसको खा लेती है और खाते है जोर जोर की आवाज करने लगती है वो चीज उसके गले  में फंस गयी है वो गिर पड़ती है सुंदरी उसके पास भाग कर पहुँचती है पहले खुद निकlलने  की कोशिश करती है फिर उसको ले कर डॉक्टर के पास जाती हैl
गाना बजता है जाने नहीं देंगे तुझे (फिल्म ३ इडियट )
सीन ४
अस्पताल का सीन है डॉक्टर कुर्सी पर बैठा है सुंदरी जलतु को ले कर आती है l सुंदरी "डॉक्टर प्लीज देखिये इसने कुछ खाया जिसमे मेटल का टुकड़ा भी था वो इसके मुँह में फास गया हैl  डॉक्टर मछली मुँह में देख कर "अरे ये तो बहुत बुरी तरह फंस गया है तुम इसको सही समय पर ले आयीं वरना मै कुछ नहीं कर पता .आज कल नदियां और समुद्र सुरक्षित (सेफ )नहीं रह गएँ है lइंसान इसमें कूड़े फेकता है लास्टिक ,मेटल ,गिलास और न जाने क्या क्या .....(डॉक्टर गहरी साँस लेता है फिर कहता है ) ये इंसान न खुद चैन से रहता है न हमको चैन से रहने देता है "(डॉक्टर ऑपरेशन करने का अभिनय करता है यहाँ गाना हो सकता  है ओ पालन हारे
थोड़ी देर बाद डॉक्टर मछली "अब कोई परेशानी नहीं  है अब ये ठीक है "कुछ देर में जलतु मछली को होश आता है l
जलतु मछली "धन्यवाद तुमने मेरी जान बचायी एक बात बताओ तुमको इस बात की जानकारी कैसे थी की वो खाने की चीज नहीं नही "सुंदरी "पढ़ने से बहुत जानकारी मिलती है l किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं होता "जलतु "मुझे पता चला गया पढ़ाई कितनी जरुरी है l मुझे मेरे गंदे व्यवहार ले किये माफ़ कर दो आगे से में भी पढ़ाई पर ध्यान दूंगीl
यहाँ गाना होता है लिखोगे पढोगे तो आगे बढ़ोगे फिल्म बारूद (१९६०)या     एक दो तीन  चार भैया बनो होशियार  फिल्म संत ज्ञान


Saturday, 16 April 2011

रिश्तों की वैतरणी


सूरज जब अपनी किरणों का लिहाफ फैला कर रात को सुला देता है तो हर शय  उम्मीद का मद्धिम गीत  गुनगुनाने लगती है ।प्रत्येक नया दिन  चुनौती,ख़ुशी आशा न जाने क्या क्या ले कर आता है  ।उसके लिए आज वह  दिन था जिसका  वह पिछले तीन सालों से  इंतजार कर रही थी .उसकी खिड़की के पास की डाली पर चिड़ियों  का एक झुण्ड न जाने क्या गुनगुना रहा था ।उसने चादर से मुँह निकाल  के देखा  -हवा में  हिलते पत्ते उसका अभिवादन कर रहे थे और इनके बीच  सुनहरी चिड़ियों का झुण्ड उसको जगाने के लिए  ,राग पर राग छेड़े जा रहा था । आज की सुबह कुछ खास थी ऐसा लग रहा  था की प्रकृति का हर  नज़ारा बस उसी के लिए जगा हो . हालाँकि उसको रात भर नींद नहीं आई थी । खुशियाँ भी कभी -कभी नींद को पलकों से दूर कर देती है .अधखुली  आँखों को जगा कर सुगन्धा  तैयार होने  के लिए बाथरूम में घुस गई .
            आज  विश्वविद्यालय उसको जल्दी पहुँचना था पर यहाँ पहुँचते -पहुँचते  देर हो ही गई थी .   सुगन्धा ने कहा-  "माँ तुम पिता जी के साथ आमंत्रित  मेहमानों की जगह पर बैठ जाओ .मै अन्दर जा कर  गाउन ले आऊँ". .आज पूरा विश्वविद्यालय कुछ खास अंदाज  में चहक रहा था .दीक्षांत समारोह सभी विद्यार्थियों के जीबन  महत्त्वपूर्ण दिन  होता है .सुगन्धा  ने देखा -जिस कमरे से गाउन  मिला था ,उसके सामने  बहुत भीड़ लगी थी ।सुगन्धा का नंबर आने में करीब २० मिनट लग गए .गाउन हाथ  में लेते ही उसको अजीब -सा अनुभव हो रहा था  । यही है वह जिसके लिए उसने बहुत मेहनत  की थी .रिश्तों की एक अजीब- सी वैतरणी पार की थी उसने ...........
अमेरिका के एयरपोर्ट पर जब वह  पहुँची ;तो उसको लगा -एक अलग सी दुनिया है ,कुछ सपनीली -सी , सब कुछ अलग बेगाने  चेहरे दूसरी भाषा ..ऊपर लगे निर्देशों को पढ़ती हुई वह बाहर  निकली तो एक अजनबी लड़की के हाथ में अपने नाम की तख्ती देख  उसी तरफ बढ़ ली .
माय नेम इस  एलेन्। आप कैसी हैं ?
इस अँगरेज़न  को हिंदी बालते देख बहुत आश्चर्य हुआ .मेरे ये भाव उस से छुपे न रहे .वह  बोली-" मेरी बहुत अच्छी दोस्त है नीलम ।उसने सिखाया  है। ज्यादा नहीं पर थोडा -थोडा बोल लेती हूँ।"
वह हिंदी कुछ अग्रेजी अंदाज़ में  बोल रही  थी ।मेरे लिए तो मानो उसकी बोली अमृत बूँद थी  ।ऐसा नहीं था की मुझे अंग्रेजी आती नहीं थी; पर यहाँ के  उच्चारण को समझने में  थोड़ी परेशानीहो रही थी..
एलेन ने कार में  सामान रखने में मदद की .एअरपोर्ट से घर तक पहुचने में एलेन ने मुझको अमेरिका और यूनीवर्सिटी   के बारे में बहुत कुछ बताया .
सुगन्धा तुम्हारे रहने के किये एक छोटे से घर का इंतजाम किया गया है ताकि तुम को अपना खाना बनाने में  आसानी हो .कुछ ग्रोसरी भी मैने लाकर रखी  है  ।"सुबह ११ बजे  तुमको लेने आऊँगी"-कहकर एलेन जाने लगी पर जाते-जाते उसने सुगंधा को  माइक्रोवेव का प्रयोग करना सिखा दिया बाकी का बाद में सिखाने का कह कर चली गई .
एलेन के जाने के बाद वह घर का जायजा लेने लगी ।एक कमरे के इस घर में  सुख -सुविधा का सब सामान उपलब्ध था  .बर्तन धोने की मशीन ,कपडे धोने की मशीन ,माइक्रोवेव ओवन सब कुछ था वह   एक एक चीज को छू कर देख रही थी .माइक्रोवेव के आलावा उसको कुछ भी चलाना नहीं आता था .अजीब मशीनरी -घर लगा उसको .कपडे बदल वह पलग  पर आ गई . इतना थकी थी की लेटते ही सो गई
  रात नीद करीब ३ बजे ही खुल गई तो यही है जेटलैक जिसके बारे में  एलन कल कह रही थी ।भारत और अमेरिका के बीच जो समय का अंतर  हैं उ;सका परिणाम है किसी तरह करवट बदल -बदल सूरज देव के निकलने का इंतजार करती रही ।जब प्रकाश ने अपने पंख फैलाये तो उसने भी बिस्तर छोड़ दिया  .एलेन उसको माइक्रोवेव का प्रयोग  करना सिखा गई थी उसने अपने लिए चाय बनाई  और प्याला ले कर  बालकनी में आ गई ।अमेरिका ,जिसके बारे में कभी उसने सोचा भर था कभी यहाँ आ सकेगी  , ये मालूम न था  ।सुगन्धा बार बार खुद को यकीन दिला रही थी  की वह वास्तव में यहाँ है .धुला- धुला -सा यह शहर बहुत खुशनुमा माहौल बिखेर रहा था पर फिर भी माँ की बहुत याद आरही थी कभी पहले वह  माँ से अलग नहीं रही थी.यहाँ आने का पता चलने पर माँ कितना परेशान  थीं
 ................................."तू कैसे जाएगी ? भारत में  ही कहीं होता तो ठीक पर सात समुन्द्र पार  कैसे भेज दूँ  .न कोई जान न पहचान ".माँ कपडे फैलाती  जा रही थी और बोलती जा रही थीं ."
.माँ ये अवसर सब को नहीं मिलता अमेरिका मे एशियन महिलाओं की मनः  स्थिति पर शोध करने के लिए पूरे भारत से मुझे चुना गया है  .ये एक्सचेंज़ प्रोग्राम के अंतर्गत  किया गया है  ।माँ मेरे लिए वहां पूरा इंतजाम होगा॥तुम परेशान मत हो ".
"परेशान कैसे न होऊं बेटा! अनजान देश का मामला है ।जब तुम्हारे बच्चे होंगे ,तब तुमको पता चलेगा .माँ क्यों परेशान होती है ".कहकर माँ बाल्टी उठा कर छत से नीचे जाने लगी मै भी उनके पीछे चल दी-"माँ तुम यदि इतना परेशान होगी तो मै कैसे जा पाऊँगी ? माँ! मेरी अच्छी माँ !!कह कर वह माँ से लिपट गई ."
"गिराएगी क्या मुझे सीढियों पर ..माँ ने कस के रेलिंग पकड़ ली -सुन  तुम मुझे पना पूरा कार्यक्रम बता दो । पता तो रहे बेटी कहाँ जाने वाली है ".
"थैंक्यू माँ थैंक्यू" .कहती वह सीढियों से नीचे भागी .ख़ुशी के मारे पैर ज़मीन  पर नहीं पड़ रहे थे सोच की उलझनों में चाय कब ख़त्म हो गई ,उसको पता ही न चला.प्याला रख कर वह अपना सामान खोलने  लगी ।कपडे निकाकर अलमारी में लगा दिए . उफ़ ! माँ भी न उसके मना  करने के बाद भी अचार मठियाँ, मिठाई मसाले सब रख दिये थे । कस्टम वालो ने  देखा नहीं वर्ना बड़ी मुसीबत हो जाती.उसने घडी देखी  साढ़े दस बज रहे थे  ।ओ माँ !देर हो गई एलेन के आने से पहले तैयार होना था. .वह जल्दी से बाथरूम में घुस गई .जब तक वह तैयार  होकर बाहर आई ११ बज चुके थे .तभी उसने दरवाजे पर नॉक सुनी .देखा ,तो एलेन थी । समय की इतनी पाबंद  थी एलेन .ये उसका पहला  सबक था शायद ,कि समय की यहाँ बहुत कीमत है ।सुगन्धा ने मन में सोचा .
""क्या तुम तैयार हो ?चलें "
"हाँ चलो" ?
यूनिवर्सिटी पहुँचते-पहुँचते  २० मिनट लग गए  ।कार  से उतर कर  वह यहाँ  के माहौल को देख रही थी .सभी अपने में  व्यस्त चले जा रहे थे। हाँ सामने आते व्यक्ति को हेल्लो कहना नहीं भूलते थे .एलेन के साथ घूमते लोगों से मिलते देर हो गई थी .यहाँ की यूनिवर्सिटी  का माहौल कितना स्वतंत्र था॥एक अजीब तरह की स्वतंत्रता थी ,यहाँ के माहौल में ।कपड़ों की स्वतंत्रता ,विचारों की स्वतंत्रता ....हर तरह की आज़ादी .एलेन ने ही उसको घर छोड़ा और बाहर से ही चली गई
  कपडे बदल कर उसने जर्नल  निकाला जो उसको एडवाइज़र मिस्टर एडम ने  दिया था .    आज वह इतने लोगो से मिली है ,पर  सिर्फ एक नाम है ;जो उसको अभी याद है- मिस्टर एडम ।इनका व्यक्तिव इतना  चुम्बकीय था कि वह न चाह  कर भी उन्ही के बारे में सोच रही थी .सफ़ेद बालों और हल्की झुर्रियों वाला उनका चेहरा अनुभव की कहानी कहता लगता था  । पहले ही दिन ,सर कहने पर एडम ने उसको मना कर दिया था -"केवल एडम कहो "-बहुत गंभीर आवाज में कहा  था  .सुगन्धा  को कुछ जर्नल और रिसर्च पेपर दे कर हफ्ते बाद मीटिंग  का कहकर विदा ली थी एडम ने .जर्नल के पन्ने  पलटते हुए सुगन्धा बस एडम की ही बातें सोच  रही थी
हफ्ते भर के बाद एडम से मीटिंग में  बहुत सी बातें हुई ।महिलाओं की स्थिति उनके विचार उनकी  अभिलाषाएँ  संवेदनाएँ  सब कुछ डिस्कस किया हमने ..मीटिंग  खत्म होने के  बाद एडम ने कहा में वैसे तो तुमको बहुत  सी महिलाओं से मिलवाऊँगा  जिनसे मिलकर हो सकता है तुम्हारी बहुत सी धारणाएँ   टूटे और कुछ नई बनें । उनकी मनः स्थिति तुमको समझनी होगी और फिर  लिखना होगा  । आज  हम एक देसी महिला से मिलने जा रहे हैं .बहुत कड़ी सुरक्षा के बाद वह  उस महिला के पास पहुँचे .एडम ने मुझसे कहा "तुम इस से बात करो । मै ऑफ़िसर के पास हूँ इस लेडी का नाम लिंच  है ".भाषा की परेशानी न हो इस वजह से सुगन्धा  को  एक इन्टरप्रेटर दे दिया गया था .सुगंधा ने जैसे ही उसके सेल में कदम रखा ,उसने सुगन्धा के  पूछने से पहले ही कहना शुरू कर दिया ."हाँ मेरे लिए पैसा सब कुछ है। मैने उसको मारा .मुझे कोई  अफ़सोस नही है  ।वह मेरे पैसे  उस चुडैल को देना  चाहता था   .मैने मना  किया तो नहीं माना ।मैने इनको सर पर जोर से हिट किया वह वहीँ मर गया । मैने ही पुलिस को काल किया और आत्मसमर्पण  कर दिया  ."जी मै  जानती हूँ आप की गलती नहीं थी आप आराम से मुझको बताइए ""सुगन्धा ने उसके हाथों को पकड़ते हुए कहा  कहा "मेरा जीवन बहुत अच्छा चल रहा था यहंग और मेरे बीच कोई तकरार नहीं थी पर वह मेरे जीवन में  ग्रहण बन कर आई  ।मै चुपचाप सब सहती रही .यहंग ने बाजार से बहुत क़र्ज़ उठाया उस चुडैल के लिए ,मै चुप रही .पर वह मेरे पैसे भी उसको देना चाहता था .सभी को लगता है कि मै सिर्फ पैसा चाहती पर यह सच नहीं है ।मै उसको बर्बादी से बचाना चाहती थी॥कई बार तो मैने उसको समझाया भी पर जानती हो उसने क्या किया ;उस चुडैल को घर ले आया और और  मेरे ही सामने ...........................मैने बहुत कुछ सहा है  उस दिन जब वह मेरा ए टी ऍम कार्ड लेकर जाने लगा । मैने उसको रोकने की बहुत कोशिश की  पर उसने मुझे धक्का दे दिया ॥मेरे सर में  चोट  लगा । खून बहने लगा .और वह औरत बेहयाई से हँसती  रही ..मुझे गुस्सा आया मैने एक फूलदान यहंग पर फेंका । मै उसको मारना नहीं  चाहती थी पर ............"'वह  हिचकियों से रोने  लगी । सुगन्धा ने लिंच के कन्धे पर हाथ रखा- तुमने सच में बहुत सहा है  ।
इन्टरप्रेटर को धन्यवाद देकर सुगन्धा ऑफिस में  आगई.
मन उदास और ऑंखें नम ..एडम ने कहा कि ख घर  तक  छोड़ देगा, पर सुगन्धा अकेले रहना चाहती थी . उसने बस से जाने का निश्चय  किया .उस ने देखा बस रुक गई थी  ।यह उसका ही स्टॉप था .रास्ता कब बीत गया ,पता ही ना चला .    'एक महिला ही दूसरी की दुश्मन होती है'- माँ ये अक्सर कहा करती थी आज उसने देख भी लिया था  ।अगले २४ घटे सुगन्धा को किसी से मिलने का मन नहीं हुआ .वह लिंच के दर्द को शब्दों का मरहम लगा लिखती रही .
समय बीतता रहा और वह  बहुत सी महिलाओं से मिलती रही .रिश्तों के कई चित्र बनते बिगड़ते रहे .ये देख जो उसको कभी बहुत शांत और सुंदर लग रह था .आज वह  इसकी शांति में  शोर को सुन रही थी .महिलाओं की स्थिति अच्छी थी तो बुरी भी कम नहीं थी .मेहमा ने अपनी बेटी को बचाने के किये उस दरिन्दे का खून किया .अकेली महिला का यहाँ रहना शायद उतना कठिन न हो जितना अपने देश में हैं  पर आसान भी न था ,.
आज उसकी  रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करते हुए एडम ने कहा था बहुत खूब सुगन्धा तुमने इन महिलाओं की  मनः स्थिति का बहुत सटीक विश्लेषण किया है .सभी उसके काम से बहुत खुश थे ।
एलेन ने कहा -सुगन्धा मै आऊँगी  कल तुमको एरपोर्ट छोड़ने
थैंक्स एलेन, तो कल मिलते हैं  ।अपनी रिपोर्ट दोनों हाथों से पकडे सुगन्धा सभी से विदा लेकर घर आने के लिए बस में बैठी .अपनी रिर्पोट को गोद में रख सुगन्धा सोच रही थी- इस शब्दों को लिखने में ,उन्हें सँजोने में उसने पूरा एक जीवन जिया है .
उस दिन  उस आखिरी महिला से मिलकर  जब वह  घर पहुँची थी  तो उसको बहुत देर हो गई थी  .उसको लग  रहा था की महा प्रलय अब होने को है .दुनिया में अच्छा कहने को कुछ बचा   ही नहीं  है .माँ.... माँ भी ऐसी हो सकती है .माँ के बारे में अपनी सारी अच्छी सोचों को आज उसने  कफ़न पहना दिया था .उसका मन कर रहा था की रात को ओढ़कर खुद को अपनी  सोचों से छुपा ले .
 .सुबह जब वह  घर से निकली थी तो उसका मन प्रसन्नता के झूले में झूल रहा था और थोडा डरा  हुआ भी था न जाने आज उसकी कौन सी धारणा टूटने वाली है और उनकी  किरचों से उसकी किस सोच का खून होने को है  ।खुश  इसलिए थी कि यह उसके अनुसन्धान का अंतिम चरण था .कुछ ही दिनों में वह  घर के लिए उडान भरने वाली थी .
दो घंटे की यात्रा करके जब सुगंधा और एडम   जेल तक पहुँचे तो वहाँ का अधिकारी उनका  इंतजार कर रहा था  .आज वह   ज़ेबा से मिलने वाले थे । ऑफिसर ने अटेंडेंट मार्गेट को उन्हें  ज़ेबा तक पहुँचाने को कहा .
आप ज़ेबा से मिलने आईं है .पर आपको एक बात कहना चाहती हूँ - ज़ेबा बात करने की स्थिति में नहीं है  ।वह  अपना मानसिक संतुलन खो बैठी है- मार्गेट ने उनसे  कहा .
आखिर ऐसा क्या हुआ इसके साथ .
शादी के पाँच साल बाद इसके बेटी हुई  ये पति- पत्नी बहुत खुश थे .पर जब वह  ३ साल की हुई तो इनको पता चला कि वह  मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं है .बच्ची का शरीर बढ़ता रहा था,पर न वह  चल सकतीं थी ,न बोल सकती थी और न वह  अपने आप  खा सकती थी .इस वेदना से वह  गुजर ही रहे थे कि ज़ेबा पुनः गर्भवती हुई .इस बार इन्होने सभी सावधानियाँ बरतीं सभी जाँच कराई .इस बार बेटा हुआ जो समय से पहले हो गया पर कुछ ही महीनो में पता चला कि वह  भी मानसिक विकलांग है .ज़ेबा एकदम मुरझा गई .बेटी अब ९ साल की हो चुकी थी और बेटा ४ साल का .इतने सालों में वह  साये की तरह अपने बच्चों के पास रहती न कहीं जाती न कोई इसके घर आता .समाज और दुनिया से ज़ेबा ने खुद को अलग कर लिया था .आप सोच रही होंगी -मैं इतना कैसे जानती हूँ ? मेरा घर ज़ेबा के घर के पास है .ज़ेबा और हामिद के साथ हमारे  अच्छे सम्बन्ध थे .उस दिन में ऑफिस में बैठी कुछ रिकॉर्ड ठीक कर रही थी ।फ़ोन बजा॥मेरे साथी जॉर्ज ने फ़ोन उठाया .दूसरी तरफ से आवाज आई -मैने उनको मार दिया .मैने उनको मार दिया 
किसको मार दिया
बच्चों को
क्यों ?
 आई वान्ट  नॉर्मल चाइल्ड आई वान्ट  नॉर्मल चाइल्ड
कैसे मार दिया
मैने उनको   ब्लीच पिलाने की कोशिश की पर वह  पी ही नहीं रहे थे मैने बहुत कोशिश की .उनको बाँधकर  भी पिलाना चाहा पर वे  नहीं पी रहे थे  । मैने तार से उनका गला घोंट दिया .बड़ी मुश्किल से मरे दोनों .
दोनों कितने बड़े थे
लड़की ९ साल की और लड़का ४ साल का  आई वान्ट  नॉर्मल चाइल्ड .
अपना पता बताइए .
ज़ेबा
३४ अल्वा रोड
सनसेट टाउन
मै एकदम घबरा गई ।उफ़ ....ज़ेबा ने ये क्या कर दिया  !हम भागकर  उसके घर पहुँचे .दोनों बच्चे बेड पर लेटे थे और ज़ेबा बस यही कह रही थी आई वान्ट  नॉर्मल चाइल्ड
तब से बस यही कहती है .देखिये ये हैं ज़ेबा .एडम और सुगन्धा अवाक् रह गए ज़ेबा के हाथ में उसके बच्चों  के कपडे थे  ।एक कोने में बैठी वह   बस यही कह रही थी आई वान्ट  नॉर्मल चाइल्ड .इसके बच्चो को इसके न रहने के बाद कौन देखेगा । शायद यही सोचा होगा .काश ! इससे बात हो पाती .
इस बार विशिष्ठ कार्य के लिए स्वर्ण पदक दिया जाता है   सुगन्धा पाण्डेय  ..को .....अपना नाम सुनकर वह  खयालो के बादलों से बाहर निकली तालियों की  ध्वनि से पूरा ऑडिटोरियम  गूँज  रहा था.डिग्री और स्वर्ण पदक ग्रहण करते हुए उसने ऊपर देखा ज़ेबा,लिंच ,मेहमा के चेहरे साफ दिख रहे थे और उनके आसपास बहुत से चेहरे गडमड  होरहे थे .वेदना के एक किनारे पर वह  सब खड़ी थी और दूसरे  पर .............

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भीगे विश्वास का दर्द

वो चल रही थी पर उसका मन भाग रहा था .धीरे धीरे उसने गति बढा दी वो लगभग दौड़ने लगी थी शायद वो अपने मन से आगे निकल जाना चाहती थी उसकी साँस फूलने लगी पसीने की चन्द बूँदें उस के माथे पर चमकने लगी पर फिर भी वो रुकी नहीं पता नहीं वो खुद से भाग रही थी या कुछ आवाजों से ................

जब से वो अर्डमोर आई थी उस ने सुबह टहलने का नियम सा बना लिया था। अपने घर से निकल कर वालमार्ट (अमेरिका की एक दुकान )तक अपने आई पौड पर गाने सुनते हुए जाना उस को बहुत अच्छा लगता था .सूरज का पीला प्रकाश जब उस के बदन को छूता था तो एक अजीब सी ऊर्जा वो अपने में महसूस करती थी. सूरज के निकलने के साथ ही चिड़ियों का चहचहाना भी बढ़ जाता ऐसा लगता मानो सूर्य  की मध्यम किरणों ने उनको हलके से सहला के जगा दिया हो .जैसे उसकी माँ जगाती थी प्रकृति से उस को प्रारंभ से ही प्यार था पर जब से अमेरिका आई थी पढाई और उसके बाद नौकरी की तलाश में उस को कभी फुर्सत ही नहीं मिली .साइंटिस्ट के पद पर जब से यहाँ आई है वो मौसम से रोज मिलती है ,हवा उसके बाल सहलाती है चिड़ियाँ गीत सुनती है और पेड़ों से झड़े फू,ल और पत्तियाँ  शबनम में नहाकर उस के आने की राह देखते हैं .

जब उसे लगा कि अब वो नहीं दौड़ पायेगी तो पार्क में लगी एक बेंच पर बैठ गई .वो पूरा पसीने से भीग चुकी थी उसने जींस से रुमाल निकाली धानी रंग के इस रुमाल के कोने में बहुत सुंदर फूल बना था उसने फूल पर हाथ फेरा माँ ने कितने प्यार से इसको काढ़ा था पर आज के दिन उसको न कुछ सोचने का मन कर रहा था और न ही मौसम का कोई भी रंग आकर्षित कर रहा था ......... .अभी दो दिन पहले वो कितनी खुश थी शुक्रवार की रात से ही समय मानो कट ही नहीं रहा था इंतजार का समय बहुत भारी होता है शायद इसी लिए बहुत धीरे बीतता है ,लैब से आने के बाद से ही वो कामों में लगी थी धुले कपडे पहाड़ की तरह अचल खड़े थे ,उसकी अलमारी उस को मुँह चिढ़ा रही थी और बेसिन में बर्तन बातें कर रहे थे. फिर अभी खाना भी बनाना था .उस के हाथ यन्त्रवत् चल रहे थे ,कपड़े तह कर के रखते और अलमारी सही करते करते रात के १२ बज गए थे ,अभी बर्तन धोना बाकी था ।वो डिश वाशर में बर्तन कम ही धुलती थी पर आज वो बहुत थक गई थी और उस को भूख भी लग गई थी अतः उसने बर्तन डिशवाशर में डाल दिया .और खुद मैगी खा कर  बिस्तर पर आ गई .पर नींद मानो आँखों में आने से इंकार कर रही थी मन भी कहाँ शांत था बस शारीर ही थकन का जमा नहीं उतार पा रहा था .ये सब बैचेनी उस को इस लिए थी की कल माँ आ रही थी .पाँच साल पहले जब वो यहाँ आ रही थी माँ उस को गले लगा कितना रोयीं थी उनकी वो हलकी गुलाबी साड़ी और उस पर बने नीले फ़ूल आज भी उसकी आँखों की खिड़की में टँगे थे.माँ को गहरे रंग बहुत पसंद थे पर पिता जी की मौत के बाद माँ ने चटकीले रंगों में सफ़ेद रंग मिला उनको हल्का कर लिया था और अब यही हलके रंग इनकी अलमारी में सिसकते हुए समां गए थे..उस दिन से पहले घर में सब कुछ ठीक था .माँ सुबह घर में संस्कार बोती.खिड़कियाँ खोल पीली नर्म धूप को आमंत्रित करती जब तक मै और पापा उठते घर बातें कर रहा होता और उस के कोने कोने में पवित्रता आसन लिए बैठी होती .मै जब प्रसाद के लिए हाथ बढाती मेरे हाथों पर एक हलकी चपत लगते "कहती पहले मुँह तो साफ कर ले".माँ के हाथों में जादू था जो भी बनाती बहुत स्वादिष्ट बनाती .मैने कभी कभी माँ को पापा से नाराज भी देखा था पर कारण क्या होता पता न चलता कुछ घंटों में ही वो दोनो फिर घुल मिल कर बातें करने लगते पर उस दिन ......"सताक्षी देख तेरे पिता जी को क्या हुआ है"- माँ चीख रही थी मै भाग कर  उनके पास पहुँची तो पापा अजीब अजीब साँसे ले रहे थे  ।माँ बदहवासी की हालत में पड़ोस के सुधांशु  अंकल को बुलाने भागी .मैने पापा को सीधा किया  । उनके मुह से झाग निकल रहा था वो कुछ कहना चाहते थे .पर आवाज कुछ साफ नहीं थी वो बार बार बोलने की कोशिश कर रहे थे इतने में माँ आ गईं साथ में सुधांशु  अंकल भी थे  ।
"मयंक आप घबराइए नहीं सब ठीक हो जायेगा"- माँ ने कहा और आंचल से उनका मुँह पोछने लगीं -"कितनी बार कहा की शराब न पियें पर मेरी सुनता कौन है "-माँ बडबड़ाती जा रहीं थी और रोती जा रहीं थी  ।सुधांशु  अंकल की सहायता से उन्होंने पापा को कार में लिटाया । पापा बार बार मेरा हाथ पकड़ रहे थे  ।कार में लेटते समय उन्होंने जिस निराश निगाह से मुझे देखा आज भी वो निगाहें मेरे मन में गडी हुई -सी महसूस होती हैं .माँ लौटी तो सब कुछ ख़त्म हो चुका था.अब न घर बातें करता था ,न सूरज घर आता था और न ही संस्कार  घर में दिखते थे  ।बस घायल आवाज और सन्नाटे की फुसफुसाहट पसरी रहती . ये सब सोचते सोचते वो कब सो गई पता ही न चला .उस की नींद खुली तो ७ बज चुके थे माँ को लेने हवाई अड्डे जाना था .आर्डमोर से वहाँ     पहुँचने में करीब १ घंटा ४० मिनट लगते हैं अब क्या करूँ- सताक्षी सोच रही थी ,क्योंकि प्लेन ९.०० बजे आने वाला था .मरी नींद का क्या करूँ इसका अपनी आप को कोसते हुए सताक्षी जल्दी जल्दी तैयार होने लगी .जब तक वो घर से निकली ७ ३० हो चुके थे .अभी माँ के लिए फूल भी लेने थे जल्दी ही कार हवा से बातें करने लगी लाल गुलाब ले कर  जब कार .हाइवे पर पहुँची ८ बज चुके थे .गति सीमा ७० किमी  थी तो सताक्षी ने स्पीड सेट कर गाड़ी क्रूस पर डाल दी .

पिता जी के जाने के बाद रिश्तेदारों ने एक एक कर नाता तोड़ लिया .माँ को कुछ भी देने से इंकार कर दिया .माँ सुबह बाहर जाती और जब लौटती मायूसी की गहरी रेखा उस के माथे पर दिखती .परिवार में लोग माँ पर तरह तरह के लांछन लगाते.मुझे ज्यादा समझ में नहीं आता पर जितना आता बुरा बहुत लगता .पापा की जगह माँ को काम मिल गयाथा .अँधेरे में दिए की रौशनी ही बहुत होती है  ।दिन भर काम करने के बाद माँ मुझे भी खुश रखने की कोशिश करती .बहारों का मौसम जब मुझपर आने लगा लोगों की गिद्ध नजर मुझको छेड़ने लगीं॥माँ को अब मेरी चिंता रहने लगी थी ।उस दिन तो हद ही हो गई,जब मेरे चचेरे भाई ने मुझे दबोचने की कोशिश की।माँ ने चाचा चाची से शिकायत कि पर चाची ने माँ को उल्टा सीधा कहना शुरू कर दिया और मुझे भी ताने देने लगीचाची ने कहा -क्या करेगी पेड़ में फल लगेगा तो पत्थर तो उछलेंगे ही .कई दिन सोचने के बाद माँ ने मुझे यहाँ     अमेरिका पढ़ने भेज दिया .

तेज हॉर्न से उसकी तंद्रा टूटी तो देखा लाल बत्ती हरी हो चुकी थी.उसने जल्दी से गाड़ी आगे बढा दी . उसकी निगाह बगल की सीट पर रखे फूलों के गुलदस्ते पर पड़ी जिसमे सुर्ख गुलाब मुस्कुरा राहे थे.उसने एक बार फूलों को ऐसे सहलाया ,जैसे माँ उसके माथे को सहलाती थी. .पास रखी पानी की बोतल को उठा कर उसने मुँह से लगा लिया और सारा पानी एक साँस में पी गई ..आज डैलस में गर्मी कुछ ज्यादा ही थी उसने ए सी बढ़ा दिया.

जब वो एयर पोर्ट पहुंची तो ९ बज कर  २० मिनट हो चुके थे. कार पार्क कर के वो जल्दी से अंदर भागी. वहाँ     देखा तो फलाइट ९०१ ,३० मिनट लेट थी .उफ्फ्फ .............उसने चैन की साँस ली .पेट में उठती भूख की लहरों का अभी ध्यान आया ,सुबह से एयर पोर्ट पहुँचने की जद्दोजहद में उसे कुछ खाने का समय ही नहीं मिला .समय बिताने के लिए और अपनी जठराग्नि को शान्त करने के लिए उसने कॉफी ली और धीरे धीरे उनकी चुस्कियाँ  लेने लगी . कॉफी के एक एक घूँट में मानो वो एक एक पल पी रही थी .तभी अनाउंस हुआ की फ़्लाइट नंबर ९०१ आने को है ।दिल की घडकन बहुत तेज होने लगी थी करीब २० मिनट बाद माँ आती दिखी माँ ने आज भी वही नीले बूटों वाली पिंक साड़ी पहनी हुई थी सताक्षी दौड़ कर  माँ से लिपट गई .माँ को कस कर  इस तरह पकड़े थी कहीं फिर माँ चली न जाएँ .माँ आप का सामान कहाँ है " सुधांशु  अंकल ला रहे हैं क्या???.......वो भी आयें है तुम ने बताया नहीं ."अरे बेटा लास्ट समय में उनका प्रोग्राम बना .ऑफिस के काम से उनको न्यूयार्क जाना है २ दिन बाद चले जाएँगे ". इतने में अंकल सामान लेकर आ गये ."हेल्लो अंकल कैसे हैं?" .संक्षिप्त सा औपचारिक प्रश्न किया था सताक्षी ने ."ठीक हूँ बेटा "अंकल ने मुस्कुरा कर  कहा आप तो बहुत बड़ी हो गईं है ". सताक्षी. ने कोई उत्तर नहीं दिया .
" माँ मेरे कठहल का अचार ,सिरका और अमावट लाई हो ना
"सब लाई हूँ बेटा ,पर सब यहीं पूछ लोगी या घर भी ले चलेगी " और मम्मी कहकर वो फिर से माँ से लिपट गई .
"इतनी बड़ी हो गई पर बचपना नहीं गया ".कह कर माँ ने सताक्षी के सर पर हलकी सी चपत लगाई.
आर्डमोर के रास्ते में माँ उसको पूरे मोहल्ले का हाल बताती रही .कुछ लोगों को तो वो जानती भी नहीं थी फिर भी सुनती रही  ।माँ का बोलना उस को बहुत अच्छा लग रहा था पाँच साल वो इस आवाज के बिना वो कैसे रही ??घर में घुसते ही माँ ने कहा ,"अरे सत तूने घर तो बहुत अच्छा रखा है साफ सुथरा .याद है अपने घर में कितना सामान फैलाया करती थी ".
सताक्षी को हँसी आ गई बीता शुक्रवार याद आ गया. बातचीत में कब २ बज गए पता न चला
"माँ कुछ खाओगी "
"नहीं बेटा कुछ नहीं अब बस आराम करना चाहती हूँ और तुम्हारे अंकल भी यही चाहते हैं ".पर सताक्षी को भूख लगी थी उसने अपने लिए सेंडविच बनाया खाकर अंकल का बिस्तर लिविंग रूम में लगा दिया और खुद वो माँ को लेकर बेड रूम में आ गई .माँ की कमर में हाथ डाल वो माँ के साथ लेटी है सताक्षी माँ के साथ हमेशा ऐसे ही सोती थी .

"माँ तुम्हारे आने से आज हर शै बातें कर रही है देखो ये तकिया बता रहा है कि तुम को याद कर कभी कभी मैने इस को कितना भिगोया है .और वो देखो ना माँ मेज पर तुम्हारी तस्वीर कह रही है कि इस को सीने से लगा कर  कितनी रातें जागी हूँ मै और प्यारी कर -कर के इस को कितना तंग किया है .मेज के सामने लगे इस बड़े पेपर को देखो ये कह रहा है कि "मै तो आप के नाम से भरा हूँ "जितनी बार तुम्हारी याद आती थी मै इस पर लिखती थी माँ .माँ मेरी अच्छी माँ ............
रात खाने की मेज पर माँ ने उसकी पसंद की सभी चीजें परोसी थी .जिनमे भारत से लाया कटहल का अचार भी शामिल था ."वाह !क्या स्वाद है मेरी भूख तो आज शांत हुई" .
"हाँ बेटा सच कहा तुम्हारी माँ बहुत अच्छा खाना बनती है अंकल ने माँ की तरफ देख कर  कहा ".
."यदि खाना इतना अच्छा लगा है तो बेटा एक रोटी और लो न ".
"अरे नहीं मैने तो ३ रोटी खा ली है एक कौर और खाया तो फट जाऊँगी ."
"अरे कोई बात नहीं मै सिल दूँगी तू खा ' सभी हँसने लगे।
 माँ बर्तन धोने लगी
"अरे नहीं माँ मै डिश वाशर में डालती हूँ .मैने सारे बर्तन डिशवाशर में डाल कर  नोब घुमा दिया .मशीन ने अपना काम शुरू कर दिया .
"अरे सत वह ये तो कमाल की मशीन है .क्या सब बर्तन साफ हो जायेंगे "
"जी माँ आप स्वयं देख लीजियेगा "
भारत और अमेरिका बीच के समय  के अन्तर के चक्कर में माँ और अंकल को बहुत नींद आ रही थी .अतः सभी ने अपना अपना सोने का ठिकाना पकड़ लिया .थोड़ी हो देर में दोनों सो गए .सताक्षी को नीद नहीं आ रही थी .थोडा सफाई करके और लैब का कुछ अधूरा काम ख़त्म कर जब सताक्षी सोने आई तो रात के १२ बज रहे थे .माँ बहुत गहरी नींद में सो रहीं थी .ऐसा लग रहा था की नींद उनको आगोश में ले कर  खुद सो गई है .माँ को देखते देखते वो भी सो गई .सुबह करीब चार बजे माँ और अंकल के हँसने की आवाज से उस की नींद टूटी .माँ कह रहीं थी अजी थोडा धीरे हँसिये सताक्षी उठ जाय़ेगी.
क्या कहती हो मन वो नहीं उठेगी गहरी नींद में हैं
माँ के लिए मन सम्बोधन सुन कर सताक्षी को बहुत बुरा लगा ; क्योंकि पापा माँ को प्यार से मन बुलाते थे .माँ का नाम मंजरी जो था फिर अचानक अंकल के मुहँ से मयंक अपने पापा का नाम सुन कर वो ध्यान से उनकी बातें सुनने लगी अंकल कह रहे थे -उस दिन यदि मयंक की शराब में हम ने जहर ................सताक्षी को लगा कि एक साथ लाखों बिच्छुओं ने उस को डंक मारा हो .
बेंच पर बैठी सताक्षी अपने बिखरे वजूद को समेटने की कोशिश कर रही थी इधर शब्द और घटनाएँ एक दूसरे से तारतम्य बैठाने की कोशिश कर रहे थे और उधर सताक्षी पतझर के बाद झड़ी पत्तियों -सा असहाय महसूस कर रही थी . पापा के जाने के बाद उसको नहीं लगा पर आज वो खुद को अकेला और अनाथ महसूस कर रही थी। वो बार बार यही कह रही थी -माँ तुम.......... क्यों माँ क्यों ? उसने आँसुओं को टी शर्ट की आस्तीन में सुखाया और माँ के लिए न्यूयार्क का टिकट खरीदने का निश्चय कर वह उठ कर चल दी उसने मुडकर देखा बेंच पर धानी रुमाल पड़ा था ।
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